भारत में स्‍वर्ण आभूषणों की हॉल-मार्किंग

 

प्रस्‍तावना

 

सांस्‍कृतिक रूप से भारतीय व्‍यक्तियों का स्‍वर्ण के प्रति अत्‍यधिक मोह है । अन्‍य एशिया के देशों की तुलना में भारत में स्‍वर्ण का हमारी सांस्‍कृतिक विरासत में अत्‍यंत महत्‍वपूर्ण स्‍थान है । स्‍वर्ण को आवश्‍यक वस्‍तु के रूप में माना जाता है, न कि एक उत्‍पाद के रूप में । स्‍वर्ण का कोई भी रूप स्‍वर्ण के किसी अन्‍य रूप के बराबर है । इसको एक रूप और अविभेद देखा गया है, जिसकी कोई ब्रांड और समाप्ति दिनांक नहीं है । इसके परिणामस्‍वरूप स्‍वर्ण की मांग मूल्‍य सापेक्ष नहीं है, बल्कि समृद्धि सापेक्ष है अर्थात घरेलू आय में वृद्धि सामान्‍यत: अधिक सवर्ण की, खरीद पर आधारित है ।

 

जब तक किसी अन्‍य धातु का अपेक्षाकृत कम अनुपात में मिश्रण न किया जाए, तब तक स्‍वर्ण और चॉंदी (रजत) इतने मुलायम होते हैं कि किसी वस्‍तु अथवा आभूषण के रूप में उनका उपयोग नहीं हो सकता । इस आवश्‍यकता के लिए हमेशा किसी नियंत्रण पद्धति मी आवश्‍यकता होती है, जिससे जनता को धोखे से बचाया जा सके, क्‍योंकि मूल्‍यवान धातुओं से निर्मित वस्‍तुओं में अपमिश्रण, सुदृढ़ मिश्रधातु का बहुत अधिक मिलावट भी एक तरह का धोखा है, जिससे जनता अत्‍यधिक असुरक्षित है । इसे तैयार करना सरल है, क्‍योकि दोनो धातुओं की मिश्रधातु की अधिकता बिना रंग के बदलाव के मिलाई जा सकती है और बिना तकनीकी परीक्षण के इसका पता नहीं चल सकता ।

 

 

भारतीय परिवेश

 

स्‍वर्ण की वार्षिक खपत जो कि 1982 में 65 टन अनुमानित था, वर्तमान में व‍ह 500 टन से अधिक हो गया है । इसमें से घरेलू मांग के लिए स्‍वर्णाभूषणों के निर्माण (मुख्‍यतया 22 कैरट शुद्धता से अधिक) के लिए लगभग 80%, निवेशकर्ता की मांग के लिए 15%  और केवल 5% औद्योगिक उपयोग के लिए है । स्‍वर्णाभूषणों मे निवेश से विशिष्‍टता ने बाजार पर अधिकार कर लिया है । शहरी क्षेत्र में स्‍वर्ण की मांग निवेश के बजाय आभूषणों के लिए है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्र में स्‍वर्ण की भूमिका औपचारिक अर्थव्‍यवस्‍था की अदला-बदली है । यहॉं स्‍वर्ण एक खुदरा कुटीर उद्योग के रूप में है और इसलिए यह कहा जा सकता है कि यह वि‍त्‍तीय भूमिका कर रहा है । यह कृषि समुदाय की  अर्थव्‍यवस्‍था की अदला-बदली है जिसके कारण भारत में 70% स्‍वर्ण की खपत होती है, जो प्रति व्‍यक्ति की वास्‍तविक आय में अप्रत्‍याशित वृद्धि के कारण टैनडम (आगे-पीछे) में लगभग 4% की दर से वृद्धि हो सकती है, इसलिए निकट भविष्‍य में वार्षिक मांग 500 टन से अधिक की जारी रहेगी

यह अनुमान है कि सारे भारत में 1,00,000 निर्माता इकाइयॉं है, जिनमें अधिकतर 10 तक कर्मचारी कार्य करते हैं, यद्यपि 100 बड़ी यांत्रिक फैक्ट्रियॉं भी हैं, जहॉं कई सौ कर्मचारी कार्य करते हैं। सस्‍ते निपुण श्रमिक की अधिकता है, क्‍योंकि परम्‍परागत स्‍वर्णाभूषण ज्‍यादातर पूर्णतया हाथ से बनाए जाते हैं, कार्यदल बड़ा होता है और लगभग दो मिलियन कुल होते हैं। इन कारीगरों में से बहुत से स्‍वर्णाभूषण निर्माण में निपुणता में 10 वर्ष की आयु से प्रशिक्षित होते हैं और उनमें औपचारिक शिक्षा का अभाव होता है।  बहुत से निर्माता और खुदरा व्‍यापारी छोटे कारखानों से उप-ठेके पर काम    करवाते हैं और इससे स्‍वर्ण के स्‍टॉक पर और कैरट की गुणता पर नियंत्रण प्राप्‍त करना मुश्किल होता है।  

             

भारतीय उपभोक्‍ता ज्‍यादातर अनियमित धातु की गुणता का शिकार होता है । उदाहरण के लिए खरीदार को यह बताया जाता है कि उसने 22 कैरट का सोना खरीदा है । जब वह इसे बेचने या विनिमय के लिए जाता है, तो उसे पता चलता है कि वास्‍तव में सोना 18 कैरट का है । बहुत से ग्राहक इस तरह अपना धन नष्‍ट कर देते हैं । भारत में उच्‍च कैरट के स्‍वर्णाभूषण पर बल दिया जाता है और उच्‍च कैरट के टांके के अभाव से भी समस्‍या उत्‍पन्‍न हो जाती है। परम्‍परागत हस्‍तशिल्‍प के 22  कैरट के नमूनों में कई टाँकों के जोड़ होते है और कम कैरट के मिश्रधातु के टांके का अर्थ है गंभीर स्‍तर पर कैरट का कम होना ।

पुराने प्रकार की धोखा-धड़ी में बहुत ज्‍यादा मिश्रधातु को मिलाने में अपमिश्रण है और बेचने में इसी तरह का धोखा है, जैसे सोना या चॉंदी की वस्‍तुऍं अधिक उत्‍कृष्‍ट मानक की होती है, लेकिन मूल धातु कोर के साथ होती है । यह धोखा-धड़ी तब तक जारी रही, जब तक भा मा ब्‍यूरो ने हॉलमार्किंग योजना आंरभ नहीं की थी ।

 

हस्‍तशिल्‍प के  स्‍वर्णाभूषणों का निर्माण परम्‍परागत तरीके और कार्य पद्धति से होता है । गलन और मिश्रण कोयला अथवा कोक से प्रज्‍जवलित भट्टी का प्रयोग करके होता है । कई छोटे कारखानों में कबाड़ खरीद लेते हैं, जिसको बिना परिष्‍कृत किए पुन: उपयोग करते हैं, जबकि अन्‍य इसके स्‍वयं ही पुराने और अशोधित प्रौद्योगिकी से परिष्‍कृत करते हैं ।

 

बड़ी फैक्‍टरियॉं आधुनिक इलेक्ट्रिक गलन इकाइयों, ढलाई सुविधाओं की लागत और उनकी अपनी आधुनिक रिफाइनरी (परिशोधन) सहित मशीनरी से युक्‍त है और अंतिम चरण में इलेक्‍ट्रोलाइट परिशोधन द्वारा या तो 999 उत्कृष्‍टता अथवा परम्‍परागत तरीके से 995 न्‍यूनतम उत्कृष्‍टता का सोना बना रहे हैं ।

 

हॉलमार्किंग स्‍वर्ण का प्रमाणन

 

भारत सरकार ने स्‍वर्णाभूषणों की खरीद में जनता को संरक्षण देने की आवश्‍यकता को पहचाना और समझा, विशेषकर उत्कृष्‍टता के मानकों और अपमिश्रण के निवारण के संबंध में, वह चाहे जानबूझकर हो अथवा आकस्मिक हो । हॉलमार्किंग योजना का मूल उद्देश्‍य जनता को अपमिश्रण की धोख-धड़ी से बचाना है और निर्माता को उत्कृष्‍टता के कानूनी मानक बनाए रख्‍ने के लिए बाध्‍य करना है । हॉल मार्किंग स्‍वर्ण में मूल्‍यवान धातु की संतुलित मात्रा की सही निर्धारण और सरकारी रिकार्ड है । इसलिए हॉलमार्क सरकारी चिह्न के रूप में प्रयुक्‍त होता है जो स्‍वर्णाभूषणों  की शुद्धता अथवा उत्कृष्‍टता की गारंटी के रूप में है ।

 

 

इन सभी पहलुओं को ध्‍यान में रखते हुए भारतीय रिजर्व बैंक स्‍वर्ण और मूल्‍यांकन धातुओं की स्‍थायी समिति ने कहा कि हॉलमार्किंग पद्धति से न केवल जनता को धोखा-धड़ी से बचाया जा सकेगा, बल्कि स्‍वर्णाभूषणों के निर्माता को भी सहायता मिलेगी । इस पर सहमत होते हु्ए समिति ने यह माना कि स्‍वर्ण के अनिवार्य प्रमाणन व्‍यापार के विशाल ढॉंचे के कारण कार्यान्‍वयन योग्‍य नहीं है । स्‍वैच्छिक योजना के अनुपालन की अनुशंसा करते हुए इस पर बल दिया गया कि उत्कृष्‍ट धातु की शुद्धता में अंतर से कानून के अंतर्गत दंड का प्रावधान होना चाहिए और देश में भा मा ब्‍यूरो अधिनियम, 1986 के प्रावधानों के अंतर्गत  स्‍वर्ण की हॉलमार्किंग के लिये भा मा ब्‍यूरो को एकमात्र अभिकरण के रूप में नियुक्‍त किया गया है ।

 

भार‍त के राष्‍ट्रीय मानक निकाय के रूप में भा मा ब्‍यूरो मानकों की तैयारी और संवर्द्धन तथा विभिन्‍न गुणता प्रमाणन  योजनाओं  के प्रचालन में प्रारंभ से ही लगा है । इस संदर्भ में भारतीय मानक ब्‍यूरो मूल्‍यवान धातुऍं विषय समिति (एमटीडी-10) ने स्‍वर्ण और स्‍वर्ण मिश्रधातुओं पर निम्‍नलिखित भारतीय मानकों का निर्धारण और प्रकाशन किया गया है :

)  IS 1417 स्‍वर्ण एवं स्‍वर्ण मिश्रधातुएं, आभूषण/शिल्‍पकारी, शुद्धता एवं मु‍हरांकन

) IS 1418 स्‍वर्ण बुलियन, स्‍वर्ण मिश्रधातु और स्‍वर्णभूषणों/शिल्‍पकारी में

    स्‍वर्ण के आकलन की पद्धति क्‍यूपलेशन (अग्नि ऐसे पद्धति)

) IS 2790 23, 22,21,18,14 और 9 कैरेट स्‍वर्ण मिश्रधातुओं के निर्माण की मार्गदर्शिका

) IS 3095 स्‍वर्णभूषणों के निर्माण में प्रयुक्‍त स्‍वर्ण के टांके

 

 अंतर्राष्‍ट्रीय हॉलमार्किंग समझौता (कन्‍वेनशन)

 

मूल्‍यवान धातु नियंत्रण पर विभिन्‍न यूरोपियन कानून विदेश व्‍यापार पर गंभीरता से रोक लगाते हैं । कोई आश्‍चर्य नहीं कि अंतर्राष्‍ट्रीय व्‍यापार आने वाले वर्षों में इस मामले में सरलीकरण और एकरूपता के बारे में मांग करे ।

 

इसलिए मूल्‍यवान धातु की वस्‍तुओं के नियंत्रण और मुहरांकन के समझौते (जिसका  नाम अंतर्राष्‍ट्रीय हॉलमार्किंग अथवा वियना परम्‍परा के रूप में था